गुरुवार, 21 जुलाई 2022

LAKSHI JI KI AARTI | लक्ष्मी जी की आरती

lakshmi aarti
माँ लक्ष्मी 

 ऊं जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुम को निस दिन सेवत, मैयाजी को निस दिन सेवत हरि विष्णु विधाता।।

ऊं जय लक्ष्मी माता 


उमा रमा ब्रह्माणी, तुम ही जग माता

ऊं मैया तुम ही जग माता।

सूर्य चन्द्र मां ध्यावत, नारद ऋषि गाता।।

ऊं जय लक्ष्मी माता 


दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पति दाता

ऊं मैया सुख सम्पति दाता।

जो कोई तुम को ध्यावत, ऋद्धि सिद्धि धन पाता।।

ऊं जय लक्ष्मी माता 


तुम पाताल निवासिनि, तुम ही शुभ दाता

ओ मैया तुम ही शुभ दाता।

कर्म प्रभाव प्रकाशिनि, भव निधि की दाता

ऊं जय लक्ष्मी माता 


जिस घर तुम रहती तह सब सद्गुण आता

ऊं मैया सब सद्गुण आता।

सब संभव हो जाता, मन नहीं घबराता।।

ऊं जय लक्ष्मी माता 


तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न कोई पाता

ऊं मैया वस्त्र न कोई पाता।

ख़ान पान का वैभव, सब तुम से आता

ऊं जय लक्ष्मी माता


शुभ गुण मंदिर सुंदर, क्षीरोदधि जाता

ऊं मैया क्षीरोदधि जाता।

रत्न चतुर्दश तुम बिन, कोई नहीं पाता

ऊं जय लक्ष्मी माता


महा लक्ष्मीजी की आरती, जो कोई जन गाता।

ऊं मैया जो कोई जन गाता।

उर आनंद समाता, पाप उतर जाता

ऊं जय लक्ष्मी माता


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Om Jai Jagdish Aarti | ॐ जय जगदीश हरे आरती

om jai jagdish hare
ब्रह्मा विष्णु महेश 

 ॐ जय जगदीश हरे

स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट

दास जनों के संकट

क्षण में दूर करे

ॐ जय जगदीश हरे


जो ध्यावे फल पावे

दुख बिनसे मन का

स्वामी दुख बिनसे मन का

सुख संपत्ती घर आवे

सुख संपत्ती घर आवे

कष्ट मिटे तन का

ॐ जय जगदीश हरे


मात पिता तुम मेरे

शरण गहूँ मैं किसकी

स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी

तुम बिन और न दूजा

तुम बिन और न दूजा

आस करूँ मैं किसकी

ॐ जय जगदीश हरे


तुम पूरण परमात्मा

तुम अंतर्यामी

स्वामी तुम अंतर्यामी

पारब्रह्म परमेश्वर

पारब्रह्म परमेश्वर

तुम सब के स्वामी

ॐ जय जगदीश हरे


तुम करुणा के सागर

तुम पालनकर्ता

स्वामी तुम पालनकर्ता

मैं मूरख खल कामी

मैं सेवक तुम स्वामी

कृपा करो भर्ता

ॐ जय जगदीश हरे


तुम हो एक अगोचर

सबके प्राणपति

स्वामी सबके प्राणपति

किस विधि मिलूँ दयामय

किस विधि मिलूँ दयामय

तुमको मैं कुमति

ॐ जय जगदीश हरे


दीनबंधु दुखहर्ता

ठाकुर तुम मेरे,

स्वामी ठाकुर तुम मेरे

अपने हाथ उठाओ,

अपने शरण लगाओ

द्वार पड़ा तेरे |

ॐ जय जगदीश हरे


विषय विकार मिटाओ

पाप हरो देवा

स्वमी पाप हरो देवा

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ

श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ

संतन की सेवा

ॐ जय जगदीश हरे


तन मन धन

सब कुछ है तेरा

स्वामी सब कुछ है तेरा

तेरा तुझ को अर्पण

तेरा तुझ को अर्पण

क्या लागे मेरा

ॐ जय जगदीश हरे


ॐ जय जगदीश हरे

स्वामी जय जगदीश हरे

भक्त जनों के संकट

दास जनों के संकट

क्षण में दूर करे

ॐ जय जगदीश हरे

                

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हनुमान जी की आरती | hanuman ji ki aarti

hanuman aarti
जय बजरंग बलि 

 ॥ आरती ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


जाके बल से गिरवर काँपे ।

रोग-दोष जाके निकट न झाँके ॥

अंजनि पुत्र महा बलदाई ।

संतन के प्रभु सदा सहाई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


दे वीरा रघुनाथ पठाए ।

लंका जारि सिया सुधि लाये ॥

लंका सो कोट समुद्र सी खाई ।

जात पवनसुत बार न लाई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


लंका जारि असुर संहारे ।

सियाराम जी के काज सँवारे ॥

लक्ष्मण मुर्छित पड़े सकारे ।

लाये संजिवन प्राण उबारे ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


पैठि पताल तोरि जमकारे ।

अहिरावण की भुजा उखारे ॥

बाईं भुजा असुर दल मारे ।

दाहिने भुजा संतजन तारे ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


सुर-नर-मुनि जन आरती उतारें ।

जय जय जय हनुमान उचारें ॥

कंचन थार कपूर लौ छाई ।

आरती करत अंजना माई ॥

आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


जो हनुमानजी की आरती गावे ।

बसहिं बैकुंठ परम पद पावे ॥

लंक विध्वंस किये रघुराई ।

तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ॥


आरती कीजै हनुमान लला की ।

दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥


॥ इति संपूर्णंम् ॥


      -----------*जय श्री राम *-----------


Hanuman Chalisa

बुधवार, 20 जुलाई 2022

Hanuman Chalisa | हनुमान चालीसा

hanuman chalisa
जय बजरंग बलि



दोहा 

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श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सूधारि।

बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥


बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥


चोपाई 

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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ १ ॥


राम दूत अतुलित बल धामा।

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥ २ ॥


महावीर विक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥ ३ ॥


कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ४ ॥


हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

काँधे मूँज जनेऊ साजै॥ ५ ॥


शंकर सुवन केसरी नंदन।

तेज प्रताप महा जग बंदन॥ ६ ॥


विद्यावान गुणी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥ ७ ॥


प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥ ८ ॥


सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।

विकट रूप धरि लंक जरावा॥ ९ ॥


भीम रूप धरि असुर सँहारे।

रामचन्द्र के काज सँवारे॥ १० ॥


लाय सँजीवनि लखन जियाए।

श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥ ११ ॥


रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ १२ ॥


सहस बदन तुम्हरो यश गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ १३ ॥


सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥ १४ ॥


यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कबी कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥ १५ ॥


तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राजपद दीन्हा॥ १६ ॥


तुम्हरो मन्त्र बिभीषण माना।

लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ १७ ॥


जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ १८ ॥


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ १९ ॥


दुर्गम काज जगत के जेते ।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ २० ॥


राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिन पैसारे॥ २१ ॥


सब सुख लहै तुम्हारी शरना।

तुम रक्षक काहू को डरना॥ २२ ॥


आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनौं लोक हाँक ते काँपे॥ २३ ॥


भूत पिशाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै॥ २४ ॥


नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ २५ ॥


संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥


सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥


और मनोरथ जो कोई लावै।

सोहि अमित जीवन फल पावै॥ २८ ॥


चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥ २९ ॥


साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥ ३० ॥


अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस वर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥


राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥ ३२ ॥


तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥ ३३ ॥


अंत काल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥ ३४ ॥


और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥ ३५ ॥


संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ ३६ ॥


जय जय जय हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ ३७ ॥


जो शत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥


जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ ३९ ॥


तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥


दोहा 

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पवनतनय संकट हरण मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥


----------* जय श्री राम *-----------

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