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बुधवार, 20 जुलाई 2022

Hanuman Chalisa | हनुमान चालीसा

hanuman chalisa
जय बजरंग बलि



दोहा 

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श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुर सूधारि।

बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥


बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।

बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार॥


चोपाई 

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जय हनुमान ज्ञान गुण सागर।

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥ १ ॥


राम दूत अतुलित बल धामा।

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥ २ ॥


महावीर विक्रम बजरंगी।

कुमति निवार सुमति के संगी॥ ३ ॥


कंचन बरन बिराज सुबेसा।

कानन कुंडल कुंचित केसा॥ ४ ॥


हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।

काँधे मूँज जनेऊ साजै॥ ५ ॥


शंकर सुवन केसरी नंदन।

तेज प्रताप महा जग बंदन॥ ६ ॥


विद्यावान गुणी अति चातुर।

राम काज करिबे को आतुर॥ ७ ॥


प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।

राम लखन सीता मन बसिया॥ ८ ॥


सूक्ष्म रूप धरी सियहिं दिखावा।

विकट रूप धरि लंक जरावा॥ ९ ॥


भीम रूप धरि असुर सँहारे।

रामचन्द्र के काज सँवारे॥ १० ॥


लाय सँजीवनि लखन जियाए।

श्री रघुबीर हरषि उर लाए॥ ११ ॥


रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई।

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥ १२ ॥


सहस बदन तुम्हरो यश गावैं।

अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥ १३ ॥


सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।

नारद सारद सहित अहीसा॥ १४ ॥


यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।

कबी कोबिद कहि सकैं कहाँ ते॥ १५ ॥


तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।

राम मिलाय राजपद दीन्हा॥ १६ ॥


तुम्हरो मन्त्र बिभीषण माना।

लंकेश्वर भए सब जग जाना॥ १७ ॥


जुग सहस्र जोजन पर भानू।

लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥ १८ ॥


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।

जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं॥ १९ ॥


दुर्गम काज जगत के जेते ।

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥ २० ॥


राम दुआरे तुम रखवारे।

होत न आज्ञा बिन पैसारे॥ २१ ॥


सब सुख लहै तुम्हारी शरना।

तुम रक्षक काहू को डरना॥ २२ ॥


आपन तेज सम्हारो आपै।

तीनौं लोक हाँक ते काँपे॥ २३ ॥


भूत पिशाच निकट नहिं आवै।

महाबीर जब नाम सुनावै॥ २४ ॥


नासै रोग हरै सब पीरा।

जपत निरंतर हनुमत बीरा॥ २५ ॥


संकट तें हनुमान छुड़ावै।

मन क्रम बचन ध्यान जो लावै॥ २६ ॥


सब पर राम तपस्वी राजा।

तिन के काज सकल तुम साजा॥ २७ ॥


और मनोरथ जो कोई लावै।

सोहि अमित जीवन फल पावै॥ २८ ॥


चारों जुग परताप तुम्हारा।

है परसिद्ध जगत उजियारा॥ २९ ॥


साधु संत के तुम रखवारे।

असुर निकंदन राम दुलारे॥ ३० ॥


अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।

अस वर दीन्ह जानकी माता॥ ३१ ॥


राम रसायन तुम्हरे पासा।

सदा रहो रघुपति के दासा॥ ३२ ॥


तुम्हरे भजन राम को पावै।

जनम जनम के दुख बिसरावै॥ ३३ ॥


अंत काल रघुबर पुर जाई।

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई॥ ३४ ॥


और देवता चित्त न धरई।

हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥ ३५ ॥


संकट कटै मिटै सब पीरा।

जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥ ३६ ॥


जय जय जय हनुमान गोसाईं।

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥ ३७ ॥


जो शत बार पाठ कर कोई।

छूटहि बंदि महा सुख होई॥ ३८ ॥


जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।

होय सिद्धि साखी गौरीसा॥ ३९ ॥


तुलसीदास सदा हरि चेरा।

कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥ ४० ॥


दोहा 

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पवनतनय संकट हरण मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप॥


----------* जय श्री राम *-----------

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