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| माँ शैलपुत्री कथा |
नवरात्रों में माँ दुर्गा के पहले सवरूप को माँ शैलपुत्री को पूजा जाता है। माँ वैष्णो देवी के इस पहले स्वरूप का बहुत महत्व है। हिमालयराज की पुत्री होने के कारण इनको माँ शैलपुत्री कहते है। माता अपने पूर्व जन्म में प्रजापति दक्ष की पुत्री थीतथा इनका नाम सती था। प्रजापति दक्ष ने इनका विवाह भगवान भोलेनाथ शिव शंकर महादेव से किया था।
एक समय की बात है जब प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का अनुष्ठान किया जिसमे उन्होंने ब्रह्मा विष्णु समेत सभी देवगणो को आमंत्रित किया पर अपने जमाई शिव शंकर को निमंत्रण नहीं दिया। देवी सती को जब इस बात का पता चला तो उनका मन व्याकुल हो उठा। तब उन्होंने भगवान शिव से अपने मायके जाने की इच्छा प्रकट की तब भगवान शिव ने उन्हें समझाया की प्रजापति दक्ष उनकी किसी बात से रुष्ठ है इसी कारणवश उन्हें निमंत्रण नहीं दिया और बिना निमत्रण किसी भी कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए परन्तु माँ सती यज्ञ में जाने को आतुर थी इसलिए भगवान शिव ने उन्हें जाने की अनुमति दे दी।
माँ सती जब अपने मायके पहुंची तब उनका सत्कार तक नहीं हुआ और अपने पिता से भगवान शिव को न निमंत्रण का कारण पूछने लगी। तब उनके पिता भगवान शिव का अपमान करने लगे। उन्होंने सोचा कि भगवान शंकर जी की बात न मानकर यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है। पिता द्वारा अपने पति की इतनी निंदा माँ सती सह ना पाई और वही सभी देवी देवताओं के सामने यज्ञ में अपने आप को भस्म कर अपने प्राण त्याग दिए।
जब इस बात की सुचना भगवान शंकर को मिली तो वह अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने अपने गणों द्वारा उस यज्ञ को विध्वंस कर दिया। तद्पश्चात माँ सती ने हिमालयराज के घर जन्म लिया जहाँ उन्हें माँ शैलपुत्री ,माँ पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है। इस जन्म में माँ शैलपुत्री ने भगवान शिव की घोर तपस्या और साधना से उन्हें पति के रूप में प्राप्त किया। चुकी माँ शैलपुत्री का वाहन वृषभ है इसलिए उन्हे वृषारूढा भी कहते है। इनके बाए हाथ में कमल और दाए हाथ में त्रिशूल होता है।
*----------- जय माता दी -----------*
