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गुरुवार, 4 अप्रैल 2024

बृहस्पतिवार व्रत कथा

 बृहस्पतिवार व्रत कथा ( सम्पूर्ण )

बृहस्पतिवार व्रत कथा
 बृहस्पतिवार व्रत कथा


व्रत  का महत्त्व एवं विधि 

भगवान बृहस्पति देव की पूजा अर्चना के लिए बृहस्पति वार  को व्रत करके , बृहस्पति वार की व्रत-कथा को पढ़ने अथवा किसी स्त्री-पुरुष द्वारा सुनने की प्राचीन परम्परा है।  बृहस्पति वार का व्रत करने और व्रत - कथा सुनने से स्त्री -पुरुषो की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है।  इस व्रत से धन-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है।  नि :संतानो को पुत्र-प्राप्ति होती है।  परिवार में सुख-शांति बानी रहती है।  सभी आनंदपूर्वक रहते है। 
बृहस्पति को सूर्योदय से पहले उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर भगवान् बृहस्पति का स्मरण करते हुए व्रत का आरंभ करना चाहिए।  उपासक को घर के किसी कक्ष में छोटा अथवा बड़ा पूजास्थल बनाकर उसमें भगवान बृहस्पति देव की प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिए।  घर के समीप किसी मंदिर में जाकर भी भगवान् बृहस्पतिदेव की पूजा की जा सकती है।  भगवान् बृहस्पति देव पीले रंग के पुष्प और पूजा की पीले रंग की सामग्री , को विशेष रूप से पसंद करते है।  इसलिए स्नान के बाद पीले रंग के वस्त्र धारण करने का विशेष महत्व बताया गया है।  पीले रंग के पुष्प, केले और पीले चंदन से भगवान बृहस्पति देव की पूजा विधान है।  बृहस्पति वार के व्रत में उपासक को पुरे दिन में एक समय ही भोजन करना चाहिए।  भोजन में चने की दाल , बेसन और दूसरे पीले रंग के खाद्य पदार्थों का ही सेवन करना चाहिए।  व्रत करने वाले पुरुष बृहस्पति को दाढ़ी व् सिर के बाल न कटाएं। पूजा के समय भगवान बृहस्पति देव से जो मनोकामना प्रकट की जाती है , वे उस मनोकामना को पूरी करते है।  इस व्रत में व्रत-कथा पढ़ने और श्रवण करने का विशेष महत्त्व है। 

बृहस्पति वार व्रत कथा 

प्राचीन समय में आर्यावर्त में दिग्विजय नामक एक राजा था।  राजा दिग्विजय अपनी प्रजा के सुख-दुःख का बहुत ध्यान रखता था।  राजा के महल से कोई निर्धन खली हाथ नहीं जाता था।  वह प्रतिदिन भगवान बृहस्पति देव की पूजा करने के लिए मंदिर में जाता था। प्र्तेक बृहस्पति को राजा भगवान बृहस्पति देव का व्रत रखता था।  भगवान बृहस्पति देव की पूजा - अर्चना के बाद व्रत -कथा सुनकर , राजा एक समय ही भोजन करता था।  लेकिन उसकी रानी राजा के पूजा-पाठ और व्रत को बिलकुल पसंद नहीं करती थी।  राजा ने उसे अनेक बार समझाया था, लेकिन उसने अपना व्यवहार बिल्कुल नहीं बदला था।  रानी कभी किसी निर्धन को अन्न , वस्त्र आदि का दान नहीं करती थी।  यही नहीं , वह राजा को भी व्रत करने और निर्धनों को दान करने के लिए मना करती थी। 

एक बार ऐसा हुआ की जंगल के कुछ हिंसक जानवरो ने नगर में घुसकर निरीह लोगों को मारना शुरू कर दिया। प्रजा के लोगो ने जब राजा दिग्विजय से जंगली जानवरों के उत्पात की शिकायत की तो वह स्वयं उनके शिकार के लिए गया।  राजा दिग्विजय शिकार पर गया हुआ था, रानी महल में आनंद से झूला झूल रही थी।  उस दिन भगवान बृहस्पतिदेव अपना रूप परिवर्तित करके , निर्धन भिक्षुक के रूप में महल के द्वार पर पहुंचे।  बृहस्पतिदेव ने रानी से भिक्षा मांगी  तो वह क्रोधमिश्रित स्वर में बोली, 'हे भिक्षुक ! सुबह से भिक्षा देते देते में तो परेशान हो गयी हूँ।  अभी मुझे महल के बहुत सारे काम करने है। महल के कामों से अवकाश मिले तो मैं  तुम्हें कुछ भिक्षा दूँ।  ' भगवान बृहस्पतिदेव ने कहा , ' हे देवी ! भिक्षा देने में भला कितना समय लगता है।  तुम भिक्षा देकर भी तो महल के काम पुरे कर सकती हो।  ' भिक्षुक के वचन सुन कर रानी ने क्रोधित होकर कहाँ , " लोगो को दान देने के लिए तो मेरे पति ही बहुत है।  वह हर समय भिक्षुकों को अन्न , वस्त्र तथा धन दान करते रहते है।  उनके इस तरह दान देने से में तो बहुत तंग आ चुकी हूँ।  इससे तो अच्छा है सारा धन समाप्त हो जाए  ताकि हम प्रतिदिन दान देने के कष्ट से मुक्त होकर चैन की साँस ले सके। "

रानी की बात सुनकर भगवान बृहस्पतिदेव मन ही मन मुस्कुराते हुए बोले , " हे रही ! भगवान तुम्हारी यह मनोकामना अवश्य पूरी करेंगे। तुम इस समस्या से छुटकारा पाना चाहती हो तो बृहस्पतिवार को सुबह सूर्योदय से पूर्व मत उठना। जब सूर्य की तेज धुप तुम्हारे बिस्तर पर पहुँच जाए तभी उठना। फिर सारे महल को गोबर से लीपकर , सिर  से पांव तक स्नान करना।  अपने लम्बे बालो को अवश्य धोना।  राजा से कहना कि वह बृहस्पतिवार को हजामत अवश्य करवाए।  राजा को भोजन में मॉस , मदिरा अवश्य देना।  निरंतर सात बृहस्पतिवार तक ऐसा करने से तुम्हें धन की मुसीबत से अवश्य मुक्ति मिल जाएगी।  " इतना कहकर भिक्षुक का रूप धारण किए भगवान बृहस्पतिदेव कुछ दूर चलकर अंतर्ध्यान हो गए।  

रानी अपने पति की दान देने की आदत से बहुत परेशान हो चुकी थी।  इसलिए कुछ सोचकर उसने परेशानी से मुक्ति पाने के लिए भिक्षुक की बताई बातों का पालन करने का निश्चय किया।  राजा ने रानी को ऐसा न करने के लिए कहा, लेकिन रानी अपनी जिद्द पर अड़ी रही। उसने राजा को धमकी दी, " यदि तुमने मेरे कथनानुसार काम नहीं किया तो मैं महल छोड़कर चली जाऊंगी। " रानी की इस बात से राजा बहुत डर गया , क्योंकि रानी के चले जाने से पुरे राज्य में उसकी बदनामी हो सकती थी।  विवश राजा को रानी की बात स्वीकार करनी ही पड़ी।  तीन बृहस्पतिवार तक रानी ने सब-कुछ भिक्षुक के बताए अनुसार ही किया।  लेकिन चौथे बृहस्पतिवार को उसे कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ी , क्यूंकि तीसरे ब्रस्पतिवार को ही सारा धन समाप्त हो गया था।  राजा का अन्न भंडार खाली हो गया।  दुसरो को अन्न, वस्त्र  दान करने वाला राजा अन्न के अभाव में भूखा मरने लगा।  उस समय राजा ने अपनी पत्नी से कहा , " रानी ! अब मै इस नगर में नहीं रह सकता।  यहाँ तो हम किसी से भिक्षा भी नहीं मांग सकते।  लोग हमारा कितना अपमान करेंगे। मै अब परदेस जा रहा हूँ।  वहां कोई काम धंधा करूँगा। शायद हमारे भाग्य बदल जाए।  " रानी को महल में छोड़कर राजा धन कमाने के लिए परदेस चला गया।  परदेस में उसने जंगल से लकड़ी काटकर लाने और नगर में बेचने का काम शुरू कर दिया। इधर रानी को कई-कई दिन खाने को कुछ नहीं मिलता था।  अतः रानी अपने अच्छे दिनों को याद कर के आंसू बहती रहती।  एक दिन रानी ने भूख से परेशान होकर अपनी दासी से कहा, " दासी ! समीप के नगर में मेरी बहन रहती है।  वह बहुत धनवान है।  तू उसके पास जाकर पांच सेर अनाज ले आ।  उस अनाज से कुछ दिन तो पेट भरेगा।  उसके बाद कहीं मेहनत मजदूरी कर के काम चलाएंगे। "रानी की बात सुनकर दासी चल पड़ी। जब दासी रानी की बहन के पास पहुंची तो वह भगवान ब्रस्पतिदेवी की पूजा -अर्चना कर रही थी।  दासी ने पांच सेर अनाज माँगा, लेकिन पूजा में व्यस्त बहन ने उसकी बार पर ध्यान नहीं दिया।  दासी कुछ देर वहां बैठ कर खाली हाथ महल में लोट आई।  उसने रानी से आकर कहा ," हे रानी ! तुम्हारी बहन अभिमानी है।  अधिक धन होने के कारण वह किसी की बात नहीं सुनती। मेरी बात का भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया।  बस, पूजा पाठ करती रही।  आखिर मुझे खाली हाथ ही लौटना पड़ा।  " रानी ने उदास मन से कहा, "दासी ! जब बुरे दिन आते है तो कोई सहायता नहीं करता।  अपने भी मुँह मोड़ लेते है।  यह सब हमारे भाग्य का दोष है। "

उधर पूजा-पाठ के बाद रानी की बहन ने जब दासी की और देखा तो वह वहां से जा चुकी थी।  बहन ने सोचा , अवश्य मेरी बहन पर कोई विपत्ति आ पड़ी है , तभी तो उसने दासी को भेजकर पांच सेर अन्नाज मंगाया है।  यह सोचकर , वह घोड़ागाड़ी में सवार हो कर रानी  से मिलने के लिए चल पड़ी।  रानी के महल में पहुंचकर उसने कहा , " बहन ! में ब्रस्पतिवार का व्रत करके भगवान बृहस्पति देव की पूजा करती हूँ।  भगवान बृहस्पतिदेव सबका कल्याण करते है।  तुम भी भगवान  बृहस्पतिदेव का स्मरण करके अपने महल के किसी कक्ष में जाकर देखो , शायद कहीं अनाज रखा मिल जाए। " बहन की बात सुन कर रानी ने मन में सोचा , उसकी धनवान बहन अवश्य ही उससे उपहास कर रही  है, लेकिन भगवान बृहस्पतिदेव का नाम लेकर वह महल के एक कक्ष में गई।  उस कक्ष में अंधेरे कोने में एक घड़ा रखा था।  रानी ने उसमे हाथ डाल कर टटोला तो सचमुच उस घड़े में अन्नाज भरा हुआ था। रानी बहुत हैरान हुई। उसने अपनी बहन से कहा , "हे बहन ! मुझे भी भगवान् बृहस्पतिदेव के व्रत की विधि बताओ।  अब में भी उसका व्रत किया करुँगी।  " तब बहन ने उसे बताया , "हे रानी बहन ! बृहस्पतिवार को सूर्योदय से पूर्व उठकर सनान करके बृहस्पतिवार का व्रत करना चाहिए।  लेकिन उस दिन सिर नहीं धोना चाहिए।  चने की दाल , मुनक्का या किशमिश लेकर केले के वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में बघवान बृहस्पतिदेव ( विष्णु जी ) की पूजा करनी चाहिए। घी  का दीपक जलाकर रखना चाहिए।  उस दिन एक समय ही भोजन करें और भोजन में चने का आटा और पीले खाद्य पदार्थ ही ग्रहण करें।  बृहस्पतिवार का व्रत करने से घर में धन - सम्पत्ति की वर्षा होती है।  अन्नाज से भंडार भरे जाते है।  इस व्रत के विधिवत करने से निसंतान को पुत्र की प्राप्ति होती है। " बहन के वचन सुनकर रानी ने तुरंत ही भगवान बृहस्पतिदेव के व्रत करने का निश्चय लिया। 

सातवें दिन जब बृहस्पतिदेव आया तो रानी ने बृहस्पतिवार का व्रत किया।  कही से मांगकर उसने चने और गुड़ का प्रबध किया। चने की दाल से केले की जड़ में विष्णु भगवान का पूजन किया और घी का दीपक जलाकर भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा की।  रानी विष्णु भगवान के भोग के लिए पिले अन्न का कहीं से प्रबंध न कर सकी। अतः वह मन-ही-मन परेशान होने लगी। उधर भगवान बृहस्पतिदेव रानी के विधिवत व्रत करने के निर्णय से बहुत प्रसन्न हुए ।  अतः वह अपना रूप परिवर्तित करके दो थालियों में पीला भोजन लेकर रानी के घर पहुंचे।  भगवान बृहस्पतिदेव ने दासी से कहा , "हे दासी ! मै तुम्हारी रानी के लिए व्रत का पीला भोजन लाया हु। " भोजन देकर वह चले गए। दासी ने रानी से भगवान बृहस्पतिदेव को भोग लगाकर उसे भोजन करने के लिए कहा।  रानी को कुछ पता नहीं था।  वह दासी से बोली , " !क्यों निर्धनता में मेरा उपहास करती है। " तब दासी ने कहा, " अभी -अभी कोई व्यक्ति मुझे दो थाली पीला भोजन देकर गया है।  वेशभूषा से तो मुझे वह कोई पुजारी जान पड़ता था। " रानी ने भगवान बृहस्पतिदेव को भोग लगाया  फिर दासी के साथ बैठ कर भोजन किया।  रानी प्रत्येक बृहस्पतिवार को विधि वत व्रत करके भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा करने लगी।  रानी के व्रत करने से भगवान बृहस्पतिदेव बहुत प्रसन्न हुए। रानी के महल में धन की वर्षा होने लगी।  कुछ ही दिनों में रानी के पास काफी धन एकत्र हो गया।  उसके अन्न भंडार भर गए। इतना सब-कुछ होने से रानी फिर पहले की तरह आलसी और अभिमानी हो गई।  एक दिन रानी ने किसी भिक्षुक को आलस्य के कारण खाली हाथ लौटा दिया तो दासी ने कहा , " हे रानी जी ! आप फिर पहले की तरह धन-सम्पत्ति पाकर आलसी हो गई है। निर्धन को अपने द्वार से खाली हाथ लौटाना अच्छा नहीं होता।  भगवान बृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से हमें अत्यधिक धन और अन्न मिला है, इसलिए आलस्य छोड़कर हमें निर्धनों को दिल खोलकर दान देना चाहिए।  दान करने से आपके परिवार का नाम होगा और भगवान बृहस्पतिदेव प्रसन्न होकर आपका कल्याण करेंगे " दासी की बात सुनकर रानी ने निर्धनों को धन देना शुरू कर दिया।  कई निर्धन ब्राह्मणो को धन देकर उनकी कन्याओ के विवाह में सहायता की।  रानी की सब जगह प्रशंसा होने लगी।  धन-सम्पति पाने पर रानी को राजा की याद सताने लगी।  रानी ने एक दिन दासी से कहा , "दासी ! पता नहीं मेरे स्वामी परदेस में किस हल में होंगे।  मुझे अब उनका पता लगाना चाहिए।  रानी ने पूजा के समय भगवान् बृहस्पतिदेव से प्रार्थना की कि उसके पति को जल्दी घर लौटने का स्मरण कराए।  उसी रात भगवान बृहस्पतिदेव ने परदेस में रह रहे राजा दिग्विजय को स्वपन में कहा, " हे राजन ! तुम अपने नगर को लौट जाओ। तुम्हारी रानी तुम्हे बहुत याद कर रही है। " राजा सुबह उड़कर , लकड़िया  काटकर लेन के लिए जंगल की और चल पड़ा।  जंगल से गुजरते हुए वह सोचने लगा - रानी की गलती से उसे कितने दुःख भोगने पड़े।  राजपठ  छोड़कर परदेस में आकर रहना पड़ा।  जंगल से लकड़िया काटकर , नगर में बेचकर गुजारा करना पड़ा।  उसी समय भगवान बृहस्पतिदेव एक सन्यासी के रूप में राजा के पास पहुंचे।  भगवान ने राजा से पूछा - " हे लकड़हारे तुम किस चिंता में पड़े हो  ? " राजा ने दुखी मन से सारी व्यथा-कथा उस सन्यासी को  सुना दी। उसकी व्यथा-कथा सुन सन्यासी ने कहा , "हे लकड़हारे ! तुम्हारी पत्नी ने भिक्षुक को धन नहीं देने के लिए आलस्य किया था।  इससे बृहस्पतिदेव क्रोधित हो गए।  उनके क्रोधित होने से ही तुम्हारी ऐसी हालत हुई।  लेकिन अब चिंता करने की कोई बात नहीं है।  तुम घर लौटकर विधिवत भगवान बृहस्पतिदेव का व्रत करना आरम्भ कर दो।  बृहस्पतिवार को भगवान बृहस्पतिदेव का व्रत कर के चने की दाल और गुड़ को जल से भरे बर्तन में डालकर केले के वृक्ष की पूजा करो।  उसके बाद व्रत-कथा सुनो।  स्वयं भी व्रत - कथा कह सकते हो।  इस प्रकार व्रत करने से भगवान बृहस्पतिदेव तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूरी करेंगे।" राजा ने सन्यासी से कहा, " हे सन्यासी ! में भगवान् बृहस्पतिदेव की पूजा तो करना चाहता हूँ , लेकिन लकडिया काटकर बेचने से बस अपना पेट ही भर पाता हूँ।  भगवान् की पूजा के लिए धन कहाँ से लाऊ  ?" राजा की बात सुनकर सन्यासी का रूप धारण किए भगवान् बृहस्पतिदेव ने कहा , " भगवान बृहस्पतिदेव का स्मरण करके तुम जंगल में जाकर लकड़िया काटना।  फिर उन्हें नगर में ले जाकर बेचना।  तुम्हे इतना धन मिल जायेगा की तुम अपने भोजन के साथ गुड़ और चने भी खरीद सकोगे। " यह कहकर सन्यासी ने भगवान बृहस्पतिदेव की कथा लकड़हारे को सुनाई।  


                        बृहस्पति देव की कथा  

प्राचीन समय में बसंतपुर नगर में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था।  ब्राह्मण की कोई संतान नहीं थी। उसकी पत्नी बहुत फूहड़ औरत थी।  बाह सुबह काफी धुप निकलने के बाद उठती थी।  प्रतिदिन स्नान भी नहीं करती थी और भगवान की पूजा करने की तो कभी सोचती भी नहीं थी।  सुबह उठते ही वह पहले भोजन करती थी।  घर में सफाई करना उसे कतई पसंद नहीं था।  ब्राह्मण अपनी पत्नी के इस आचरण से बहुत दुखी था।  भगवान की अनुकम्पा से उस ब्राह्मण की पत्नी गर्भवती हुई और उसने दसवें महीने एक सुंदर कन्या को जन्म दिया। निर्धन ब्राह्मण कन्या के जैम से बहुत दुखी हुआ।  धीरे-धीरे ब्राह्मण की कन्या बड़ी होने लगी।  बचपन से ही उस कन्या की रुर्ची भगवान विष्णु की पूजा में थी।  वह प्रातः उठते ही स्नानादि करके भगवान विष्णु की पूजा करने मंदिर में जाती थी। बृहस्पतिवार को व्रत करके विधिवत पूजा-पाठ करती थी।  पूजा-पाठ के बाद वह पढ़ने के लिए पाठशाला में जाती थी।  घर से चलते हुए वह मुट्ठी भर जौ साथ ले कर जाती और पाठशाला के रस्ते में थोड़े-थोड़े जौ गिराती जाती थी।  जब वह पाठशाला से घर लौटती तो जौ के वह दाने सोने में बदले हुए मिलते थे।  लड़की सभी सोने के दाने बीन लाती थी। एक दिन जब वह सोने के दानो को साफ़ कर रही थी तो उसकी माँ ने कहा , " बेटी ! सोने के दाने साफ़ काने के लिए सोने का सुप भी होना चाहिए। " अगले दिन बृहस्पतिवार था।  उसने भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा करते हुए प्रार्थना की, "हे भगवान ! यदि मेने आपका व्रत विधिवत किया हो तो मुझे सोने का सुप दे दो। " भगवान बृहस्पतिदेव ने उसकी मनोकामना पूरी करने का वचन दिया।  पाठशाला से लौटते समय उसे रस्ते में सोने का सूप पड़ा हुआ मिला। घर लौटकर सोने का सुप अपनी माँ को दिखाकर वह सोने के दाने साफ़ करने लगी. उसी समय नगर का राजकुमार उसके घर के पास से गुजरा। उस सुंदर लड़की को सोने के सूप में जो साफ़ करते देख राजकुमार उस लड़की पर मोहित हो गया।  महल में लौटकर राजकुमार ने राजा से उस लड़की से विवाह करने की इच्छा प्रकट की तो राजा ने ब्राह्मण को महल में बुलाकर राजकुमार से उसकी लड़की के विवाह की बात कही।  ब्राह्मण तैयार हो गया।  धूमधाम से उस लड़की का विवाह राजकुमार से हो गया।  दुल्हन बनकर ब्राह्मण की लड़की महल में चली गई।  लड़की के चले जाने से ब्राह्मण फिर निर्धन हो गया।  उसे कई-कई दिन भोजन भी नहीं मिलता था।  बहुत दुखी होकर ब्राह्मण एक दिन अपनी लड़की के पास गया अपने पिता से निर्धनता का सम्माचार सुनकर उसने बहुत-सा धन देकर पिता को विदा किया।  उस धन से ब्राह्मण के कुछ दिन तो आराम से गुजर गए। लेकिन जल्दी ही फिर  हालत हो गई।  ब्राह्मण अपनी लड़की से धन लेने के लिए फिर महल में पहुंचा। लड़की ने पिता की बुरी हालत देखकर कहा, "पिताजी ! आखिर आप कब तक मुझसे धन लेकर जीवन-यापन करेंगे। आप कोई ऐसा उपाय क्यों नहीं करते जिससे आपका घर धन-सम्पत्ति से भर जाए। " ब्राह्मण ने कहा , : मेने तेरी माँ को बहुत समझा लिया , पर उसकी समझ में कुछ नहीं आता।  उसका फूहड़पन नष्ट हो तो घर की निर्धनता भी दूर हो जाए। " तब कुछ सोचकर लड़की ने पिता से कहा , "पिताजी ! आप कुछ दिनों के लिए माँ को मेरे पास छोड़ जाओ। " ब्राह्मण अपनी पत्नी को लड़की के पास महल में छोड़ आया।  लड़की ने अपनी माँ से कहा, " माँ , तुम कल प्रातः उठकर स्नानादि करके भगवान् बृहस्पतिदेव ( विष्णु ) की पूजा अवश्य करना। पूजा काने से तुम्हारी निर्धनता अवश्य दूर हो जाएगी। " लेकिन उसकी माँ ने उसकी कोई बात नहीं मानी।  तब क्रोधित होकर लड़की ने अपनी माँ को एक कक्ष में बंद कर दिया।  सर्योदय के समय माँ को उठाकर , जबरदस्ती उसे स्न्नान कराया और फिर मंदिर में ले जाकर भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा कराई।  कुछ दिनों तक ऐसा करने से माँ की बुद्धि में परिवर्तन हुआ और वह स्वयं बृहस्पतिवार का व्रत रखने लगी।  उसके व्रत रखने से ब्राह्मण के घर में भगवान विष्णु की अनुकम्पा से धन की वर्षा होने  लगी। दोनों पति-पत्नी धन -सम्पति पाकर आनन्दपूर्क जीवन-यापन करते हुए विष्णु धाम को चले गए। 

लकड़हारा बने राजा ने सन्यासी से भगवान बृहस्पतिदेव की यह कथा सुनकर बृहस्पतिवार का व्रत करके भगवान विष्णु की पूजा की। उस दिन से उसके सभी कलेश दूर हो गए।  लेकिन अगले बृहस्पतिवार को कामकाज में अधिक व्यस्त होने के कारण उसने भगवान बृहस्पतिदेव का व्रत नहीं किया।  भगवान् बृहस्पतिदेव लकड़हारे से क्रोधित हुए और उसे भूल की सजा दी।  उस दिन नगर के राजा ने नगर में घोषणा करके सबको सूचित किया , "प्रत्येक नागरिक मेरे महल में भोजन करने आए।  जो नहीं आएगा, उसे अपराधी मानकर भरी दंड दिया जाएगा। " लकड़हारा बने राजा ने उस नगर के राजा की घोषणा तो सुनी , लेकिन जंगल से लकड़ी काटकर लेन और उसे बेचने में देर हो जाने के कारण वह समय पर महल में भोजन करने नहीं जा सका।  अतः राजा के सैनिक लकड़हारे को पकड़कर कर महल में ले गए।  राजा ने उसे महल के एक कक्ष में बैठकर भोजन कराया।  उस कक्ष में एक खूंटी पर रानी का सोने का हार लटका हुआ था।  लकड़हारा अकेला उस कक्ष में भोजन क्र रहा था।  तभी उसने एक आश्चर्यजनक घटना घटती देखी।  देखते-ही -देखते वह खूंटी हार को निगल गई।  थोड़ी देर के बाद नगर के राजा ने हार को गायब देखा तो लकड़हारे को कारावास में डलवा दिया।  लकड़हारा मन ही मन अपने भाग्य को कोसने लगा।  तभी उसे जंगल में मिले सन्यासी का स्मरण हुआ।  थोड़ी देर में भगवान बृहस्पतिदेव सन्यासी के रूप में उसके सामने प्रकट हुए और कहा , " हे लकड़हारे !तुमने भगवान बृहस्पतिदेव की पूजा नहीं की , इसी कारण  तुम्हे कष्ट हुआ है लेकिन अब चिंता मत करो बृहस्पतिवार के दिन कारगार के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेंगे।  उन पैसे से भगवान् बृहस्पति देव का व्रत करके उनकी पूजा करोगे तो तुम्हारे सभी दुःख नष्ट हो जायेंगे।  बृहस्पतिवार के दिन दरवाजे पर मिले पैसो से चने और गुड़ मंगाकर लकड़हारे ने बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुनाई तो भगवान् बृहस्पतिदेव ने प्रसन होकर उस नगर के राजा को स्वपन में लकड़हारे को कारागार से मुक्त करने को कहा।  सुबह राजा ने अपने कक्ष में आकर देखा तो खुटी पर रानी का हार मिल गया।  राजा ने लकड़हारे को मुक्त कर दिया और उसे धन और आभूषण देकर विदा किया। लकड़हारा बना राजा उस नगर से चलकर अपने नगर में पहुंचा तो उस नगर में कुँए , धर्मशाला , बाग़-बग़ीचे देख कर बहुत प्रसन्न हुआ।  राजा ने किसी से पूछा " ये कुँए धर्मशालाए किसने बनवाई है ? "सबने उसे बताया की ये सब उसकी रानी और दासी बनवाये है।  राजा महल में पहुंचा तो रानी ने उसका भव्य स्वागत किया।  तब राजा ने निश्चय किया की सप्ताह में एक बार तो सभी बृहस्पतिदेव का व्रत तथा पूजन करते है परन्तु में प्रतिदिन व्रत किया करूँगा और दिन में तीन बार कथा कहाँ करुंगा।  अब राजा हर समय दुशाले में चने की दाल बांधे  रहता तथा दिन में तीन बार बृहस्पतिदेव की कथा कहता।  कुछ दिनों के बाद राजा को अपनी बहन की याद आयी।  एक दिन घोड़े पर स्वार होकर राजा अपनी बहन से मिलने चल दिया। अभी राजा नगर के बाहर ही पहुंचा था की उसने कुछ लोग को शव को ले जाते हुए देखा।  राजा को स्मरण हुआ की आज उसने किसी को बृहस्पतिवार की व्रत कथा नहीं सुनाई है।  राजा ने उन लोगो को रोक कर कहा "भाइयो आप शव को ले जाने से पहले मुझसे बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुन ले।  लोगो ने राजा पर क्रोधित होते हुए कहाँ " तुम  पागल तो नहीं हो गए हो " लेकिन कुछ बूढ़े लोगो ने कहा अच्छा भाई साथ चलते चलते तुम अपनी कथा सुना लो। राजा ने चलते हुए आधी कथा ही सुनाई थी की शव हिलने लगा।  राजा के पूरी कथा सुनते ही शव उठ कर बैठ गया।  लोगो ने हैरानी से दातों तले ऊँगली दबाई और अगले बृहस्पतिवार से भगवान बृहस्पतिदेव का व्रत एवं कथा सुनने का निश्चय कर लिया। 

घोड़े पर सवार राजा चलते हुए एक किसान के पास पहुंचा।  किसान अपने में हल चला रहा था राजा ने कहा " अरे भाई मुझसे बृहस्पतिवार की कथा सुन लो " किसान झुंझलाकर बोला "भाई देख नहीं रहे जितनी देर तक तुम्हारी कथा  सुनूंगा उतनी देर में तो पुरे खेत में हल चला लूंगा।  राजा निराश होकर आगे चलने लगा तभी किसान के बैल लड़खड़ाकर जमीन में जा गिरे।  किसान के पेट में जोरो का दर्द होने लगा।  उस किसान की पत्नी जब खाना लेकर आई तो उसने किसान से इस बारे में पूछा। किसान ने घुड़सवार की पूरी कहानी सुनाई किसान की पत्नी दौड़ती हुई राजा के पास पहुंचकर हाथ जोड़ कर बोली " भइया में तुम्हारी कथा सुनने को तैयार हु।  राजा ने उनके साथ खेत पर पहुँच कर बृहस्पतिवार की व्रत कथा सुनाई।  तभी बैल उठकर खड़े  हो गए।  किसान के पेट का दर्द भी तुरत ठीक हो गया।  

राजा अपनी बहन के घर पहुंचा तो उसकी बहुत आओभगत हुई।  अगले दिन सुबह  राजा ने उठकर देखा सभी लोग भोजन  कर रहे है। किसी भूखे को बृहस्पतिवार की कथा सुनाये बिना राजा भोजन नहीं करता था।  उसने बहन से कहा " बहन ! क्या घर में कोई ऐसा व्यक्ति है जिसने भोजन न किया हो।  " उसकी बहन बोली " भैया ! हमारे घर में तो क्या आपको पुरे नगर में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसने सुबह सुबह भोजन नहीं  किया हो।  तब राजा ने बहन के घर से निकल कर उस नगर में बिना भोजन किये व्यक्ति की तलाश की।  एक गड़रिये के घर में उसका बेटा बीमार होने के कारण भूखा रह गया था।  राजा ने उस बेटे को जाकर बृहस्पतिवार की कथा सुनाई।  कथा सुनते-सुनते गड़रिये का बीमार बेटा बिलकुल ठीक हो गया।  . सबने राजा की बहुत प्रशंसा की। 

एक दिन राजा ने अपनी बहन से कहा। बहन अब हम अपने घर जाना चाहते है। तुम भी हमारे साथ चलो कुछ दिन वह वहां रहकर लोट आना।  राजा की बहन ने अपनी साँस से पूछा तो सांस ने ताने देते हुए कहा।" बहु ! मायके जाना तो अकेले जाना मेरे पोतो को नहीं ले जाना। तुम्हारे भाई के कोई संतान नहीं है कही तुम्हारी भाभी मेरे पोतो पर कोई जादू टोना न कर दे।  दूसरे कक्ष में बहन की साँस की बाते सुन के राजा दुखी मन से अकेले ही अपने नगर को लोट गया।  रानी ने राजा से कहा " आप तो अपनी बहन को साथ लाने की बात कह कर गए थे। फिर बहन को साथ क्यों नहीं लाये ? " राजा ने दुखी होते हुए कहा " हे रानी ! हम निसंतान है इसलिए कोई हमारे घर आना पसंद नहीं करता।  रानी ने राजा को समझाया।  हे प्राणनाथ ! हमें बृहस्पतिदेव ने सबकुछ दिया है। अब भगवान् बृहस्पतिदेव हमें संतान भी अवश्य देंगे।  " बृहस्पतिवार को विधिवत व्रत करते हुए राजा -रानी ने भगवान् बृहस्पतिदेव से संतान के लिए प्रथना की।  कुछ दिनों के बाद उन्होंने स्वपन में दर्शन देते हुए कहा , " हे राजन ! तेरी मनोकामना पूरी होगी।  " एक सप्ताह बाद ही रानी गर्भवती हो गई। दसवे महीने में रानी ने सुंदर पुत्र को जन्म दिया।  राजा -रानी जीवनपर्यतन बृहस्पतिवार का व्रत करते रहे।  उनके घर में धन की वर्षा होती रही। आनन्दपूर्क जीवन-यापन करते हुए राजा-रानी  भगवान बृहस्पतिदेव की अनुकम्पा से मोक्ष को प्राप्त करके सीधे बैकुण्ठ  धाम पहुँच गए।  

बृहस्पतिवार को विधिवत व्रत करके जो स्त्री-पुरुष भगवान् विष्णु  की पूजा करते है , भगवान् उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी करते है।  

                                               इति श्री बृहस्पतिवार व्रत कथा 


बृहस्पतिवार व्रत कथा

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